गर अंज़ाम है जुदाई तो फ़िर मिलाता क्यूँ है
या इलाही हमको इतना सताता क्यूँ है।
दिल का हर दर्द बराबर छुपाया था हमने ,
बेईमान फ़िर आंखोसे जताता क्यों है।
टूटी हुई उम्मीदों को फ़िर सजाया हमने,
ये वक्त तकाजा हमिपे आजमाता क्यों है।
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